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दूरगामी महत्व का फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला दूरगामी महत्व का है कि धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट मांगना गैरकानूनी है। इस निर्णय के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 के एक मामले में की गई न्यायिक टिप्पणियों से पैदा हुए भ्रमों का निवारण कर दिया है। तब जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि चुनावी भाषणों में हिंदुत्व या हिंदू धर्म के उल्लेख का हमेशा यह अर्थ नहीं समझा जा सकता कि धर्म के आधार पर वोट मांगा गया। तब न्यायालय ने कहा था - भाषण में हिंदुत्व या हिंदू धर्म का जिक्र भारतीय जनता की जीवन पद्धति और भारतीय सांस्कृतिक लोकाचार पर जोर डालने के लिए भी किया जाता है। मामला जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 123(3) की व्याख्या से संबंधित था। ताजा प्रकरण में जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता वाली बेंच की टिप्पणियों पर स्पष्टता लाने की गुजारिश की गई थी। इसके लिए न्यायालय ने सात जजों की संविधान पीठ बनाई। लेकिन सभी जज समान व्याख्या पर सहमत नहीं हुए। तब प्रधान न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर और तीन अन्य जजों ने बहुमत से फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित ने अलग से असहमत फैसला सुनाया। बहरहाल, जजों के बहुमत की राय यही रही कि चुनाव एक सांसारिक क्रिया है। इसे दुनियावी मसलों एवं मुद्दों के आधार पर ही लड़ा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा - मनुष्य एवं ईश्वर के बीच का संबंध एक व्यक्तिगत चयन है। राज्य के लिए ऐसी किसी गतिविधि में दखल देना प्रतिबंधित है। स्पष्टत: राजनीति का संबंध राज्य-व्यवस्था की नीति से है। अत: कोर्ट ने धर्म (या अध्यात्म) से (जिसका संबंध पारलौकिक मामलों से है) राजनीति को अलग रखने के पक्ष में राय जताई है। ताजा फैसले का सीधा अर्थ है कि आगे से धर्म या जाति के नाम पर वोट मांगना गलत चुनावी आचरण माना जाएगा। आरोप सिद्ध होने पर आरोपी उम्मीदवार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकेगी। प्रत्याशी विजयी हुआ हो, तो इस आधार पर उसकी सदस्यता रद्द हो सकेगी। आशा है कि सभी राजनीतिक दल आगे से चुनाव प्रचार में उतरते वक्त इस निर्णय का खयाल रखेंगे। दरअसल, कोर्ट ने भारत के विधि शास्त्र में कोई नया सिद्धांत नहीं जोड़ा है। बल्कि भारतीय संविधान की मूल भावना की पुनर्पुष्टि भर की है। इसी भावना के अनुरूप जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) में प्रावधान किया गया था कि वोट मांगने के दौरान धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर जनसमुदायों के बीच शत्रुता या नफरत की भावना फैलाना भ्रष्ट आचरण माना जाएगा। इस पर कोई भ्रम नहीं था। मगर 1995 के फैसले में हिंदुत्व को धर्म के बजाय जीवन पद्धति बताए जाने से कुछ गलतफहमियां पैदा हुईं। अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दूर कर दिया है। इससे चुनावी माहौल सुधरने और भारतीय लोकतंत्र के मजबूत होने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
  Posted By on : 04-Jan-2017 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

आर्थिक आफत नहीं समाधान है नोटबंदी
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने बड़े नोटों के विमुद्रीकरण के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए उसे अभूतपूर्व विफलता करार दिया है। एक अंग्रेजी अखबार में इस आशय का लेख लिखते समय वह अर्थशास्त्री की तरह कम, पूर्व प्रधानमंत्री की तरह अधिक दिखे हैं। कोरी बातों नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर निर्णय हो कि विमुद्रीकरण आफत है या उपचार? क्या यह अर्थव्यवस्था का अभूतपूर्व कुप्रबंधन है जैसा डॉ. सिंह आरोप लगा रहे हैं या यह सत्तर सालों की जमा हुई गंदगी का इलाज है, जैसा कि नरेंद्र मोदी दावा कर रहे हैं? इसका उत्तर जानने के लिए 1999 से 2004 तक के राजग और 2004 से 2014 तक के संप्रग शासनकाल की अर्थव्यवस्था पर निगाह डालनी होगी। 1999 से 2004 तक के राजग शासनकाल के दौरान सालाना 5.5 प्रतिशत के हिसाब से रियल जीडीपी 27.8 फीसदी बढ़ी। सालाना धन आपूर्ति (जिससे मुद्रास्फीति को गति मिलती है) 15.3 फीसदी बढ़ी। कीमतें सालाना 4.6 प्रतिशत के हिसाब से 23 प्रतिशत बढ़ीं। इन पांच वर्षों में संपत्ति की कीमतों में मामूली इजाफा हुआ। स्टॉक 32 प्रतिशत की दर से बढ़ा। सोने की कीमतें 38 प्रतिशत की दर से बढ़ीं। करीब 600 लाख नई नौकरियां पैदा हुईं। अब अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुआई वाले संप्रग के शासनकाल पर आते हैं। घपलों-घोटालों में घिरने से पहले, 2004 से लेकर 2010 तक संप्रग शासनकाल में सालाना 8.4 प्रतिशत के हिसाब से रियल जीडीपी 50.8 प्रतिशत बढ़ी। यानी इस दौरान राजग के शासनकाल की तुलना में डेढ़ गुना अधिक तेजी से विकास हुआ। लेकिन आखिर संप्रग की उच्च विकास दर ने नौकरियां कितनी पैदा कीं? एनएसएसओ के आंकडे के अनुसार तब देश में सिर्फ 27 लाख नई नौकरियां पैदा हो पाई थीं, जबकि राजग के पांच साल के वक्त में 600 लाख नौकरियां सृजित हुई। अब डॉ. सिंह विलाप कर रहे हैं कि मोदी सरकार का नोटबंदी का फैसला नौकरियां खत्म करेगा! राजग के समय 4.6 प्रतिशत की तुलना में संप्रग के 2004 से 2010 तक के कालखंड में कीमतें 6.4 प्रतिशत की दर से बढ़ीं। आखिर संप्रग के वक्त तीव्र विकास रोजगार पैदा क्यों नहीं कर पाया? इसका रहस्य यह है कि उत्पादन नहीं, बल्कि संपत्ति की कीमतों में जबर्दस्त इजाफे को उच्च विकास की तरह दर्शाया गया। संप्रग के पहले छह साल के कार्यकाल में स्टॉक और सोने की कीमतों में तीन गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई। संपत्ति की कीमतें हर दो साल में दोगुनी हो गईं। गुडगांव (जो 1999 में संपत्ति के नक्शे पर नहीं था) में जमीन की कीमतें दस से बीस गुना तक बढ़ गईं। छह सालों में संपत्ति में मुद्रास्फीति की दर सालाना नॉमिनल जीडीपी की विकास दर से तीन गुना अधिक थी। जमीन-जायदाद की कीमतों में यह वृद्धि संप्रग के उच्च विकास का नतीजा नहीं, बल्कि एक वजह थी। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि पैसा, विकास, कीमतें और रोजगार आपस में जुड़े हुए होते हैं। अब राजग और संप्रग के शासन में इस नियम को लागू कीजिए। 2004-2010 के बीच औसत धनापूर्ति में वार्षिक 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई ( राजग के समय यह 15.3 प्रतिशत थी) लेकिन संपत्ति की कीमतें इससे कई गुना बढ़ीं। अब जब राजग के कार्यकाल के मुकाबले धनापूर्ति में मामूली वृद्धि हुई, तो संपत्ति की कीमतों में अनाप-शनाप बढ़ोतरी कैसे हो गई? इसका सुराग हमें बिना निगरानी वाले पांच सौ और हजार रुपए के नोटों की भारीभरकम संख्या में मिलता है। 1999 में लोगों के पास मौजूद कैश जीडीपी का महज 9.4 प्रतिशत था। 2007-08 तक बैंक और डिजिटल पेमेंट में बढ़ोतरी के बावजूद यह आंकड़ा 13 फीसदी तक पहुंच गया। फिर यह 12 प्रतिशत के आसपास बना रहा। इससे भी अहम बात यह है कि लोगों के पास मौजूद बड़े नोटों का जो प्रतिशत 2004 में 34 था, वह 2010 में दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर 79 प्रतिशत तक पहुंच गया। आठ नवंबर 2016 को यह आंकड़ा तकरीबन 87 प्रतिशत था। रिजर्व बैंक ने गौर किया है कि एक हजार रुपए के नोटों का दो तिहाई और पांच सौ के नोटों का एक तिहाई (जो मिलकर छह लाख करोड़ रुपए है) जारी होने के बाद से कभी बैंकों में नहीं पहुंचा। बैंकों से बाहर मौजूद यह बड़ी राशि काले धन के रूप में सोने व संपत्तियों में इधर से उधर होती रही। इसका एक हिस्सा पार्टिसिपेटरी नोट के जरिए भी इधर-उधर होता रहा। संपत्तियों की कीमतों में वृद्धि से उपजे रोजगाररहित विकास के अभिशाप से छुटकारा तब तक असंभव था, जब तक बिना निगरानी वाले ऊंची कीमत के नोट चलन में बने रहते, जिससे फर्जी विकास को गति मिलती है। मनमोहन सिंह को तभी चेत जाना चाहिए था जब 2004 के बाद से हर साल ऊंची कीमत वाले नोटों का हिस्सा बढ़ता जा रहा था। वह तेजी से फैल रही कैश इकोनॉमी को थाम सकते थे, अगर उन्होंने बड़े नोटों के स्थान पर कम मूल्य वाले नोटों के चलन को बढ़ावा दिया होता। तब नोटबंदी जैसे कदम को भी नहीं उठाना पड़ता, जिससे न जनता को परेशानी उठानी पड़ती और न ही अर्थव्यवस्था को अल्पकालिक नुकसान उठाना पड़ता। हां, इससे उन्हें कथित उच्च विकास के तमगे से जरूर वंचित होना पड़ता, जिसे संप्रग शासन की सफलता की कहानी के रूप में पेश किया जाता है। अर्थव्यवस्था के इस छलावे को बेनकाब करने व रोजगार-उत्पादक विकास को पुनर्जीवित करने के लिए बिना निगरानी के चल रहे ऊंची कीमत वाले नोटों को बलपूर्वक बैंकिंग के दायरे में लाने की जरूरत थी, लेकिन अपनी निष्क्रियता से मनमोहन सिंह ने अर्थव्यवस्था को बहुत बड़े भंवर में फंसा दिया। मोदी सरकार के पास दो विकल्प थे। एक, मौजूदा स्थिति को जारी रखते हुए उसी राह पर आगे बढ़ते रहना या दूसरा, असली विकास और नौकरियों को वापस लाने के लिए विकास में अस्थायी गिरावट का रास्ता चुनना। मोदी सरकार ने दूसरी राह चुनी है।
  Posted By on : 17-Dec-2016 Post Comment > > | View all 1 Comments > >
 

वैश्विक आर्थिक चुनौतियों पर जरूरी चिंतन
उद्योग व कारोबार जगत के बड़े नामों के साथ बैठकर विचार-विमर्श की शुरुआत तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तब की थी, जब अर्थव्यवस्था की विकास दर गिरने लगी थी। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने 15 महीनों के कार्यकाल के बाद ऐसी बैठक तब बुलाई, जब आर्थिक क्षितिज पर आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं। किंतु फर्क यह है कि डॉ. सिंह ने जब ये पहल की, तब तक यूपीए-2 सरकार की नीति-निर्णय संबंधी क्षमता के पंगु होने की धारणा व्याप्त हो गई थी, जबकि मोदी के नेतृत्व में अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की उम्मीदें अभी बची हुई हैं। मगर चिंताजनक समान पहलू यह है कि तब भी अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों के मुख्य कारण देश के बाहर थे, और आज भी वैसा ही है। फिलहाल चीन के आर्थिक संकट तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार ने भारत जैसे उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों के सामने कठिन मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। प्रधानमंत्री की पहल का उद्देश्य इस बिंदु पर ही विचार-विमर्श करना था कि क्या वैश्विक चुनौतियों को भारत अपने लिए अवसर बना सकता है? इस पर चर्चा के लिए उद्योगपति और मोदी व उनके मंत्री आमने-सामने बैठे। बातचीत का जो ब्योरा सामने आया है कि उसका सार यही है कि सरकार और उद्योग जगत दोनों को एक-दूसरे से ऊंची अपेक्षाएं हैं। प्रधानमंत्री ने जोखिम उठाने और निवेश बढ़ाने की जरूरत बताई, तो उद्योगपतियों ने ब्याज दरों में कटौती तथा कारोबार करना आसान बनाने के लिए नीतिगत कदम उठाने पर जोर डाला। सरकार ने बताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है। इसलिए मौजूदा वैश्विक उथल-पुथल का सबसे कम असर भारत पर ही होगा। यह वो तथ्य है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं ने भी माना है। इसके बावजूद हकीकत यह है कि मांग और निवेश नहीं बढ़ रहे हैं। कंपनियों का मुनाफा गिरा है। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर भी गिरी। शेयर बाजार में भी ग्रहण लगता दिख रहा है। इन हालात में उद्योग जगत का उत्साह कुछ ठंडा पड़ा है। उसकी सरकार से कुछ शिकायतें भी हैं। भूमि अधिग्रहण बिल पर सरकार का यू-टर्न, जीएसटी बिल पास न होना, श्रम सुधारों पर प्रगति न होना, कर मामलों में अपेक्षित स्पष्टता न आना और सबसिडी में भारी कटौती न होना उसकी प्रमुख चिंताएं हैं। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी जैसी प्रधानमंत्री की प्राथमिकताओं से उद्योग जगत खुश तो है, लेकिन वह इन पर तीव्र गति से अमल तथा ठोस उपलब्धियां चाहता है। इसीलिए कारोबारी मांगों की लंबी सूची लेकर आए। सकारात्मक बात यह है कि इस बैठक से दोनों पक्षों को एक-दूसरे की अपेक्षाएं समझने में मदद मिली। लेकिन इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकट से बचाने, अथवा संकट को अवसर में तब्दील करने में कितनी मदद मिलेगी, इस बारे में अभी कुछ कहना कठिन है।
  Posted By on : 22-Nov-2016 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

हालात नहीं नजरिया बनाता है जिंदगी

कितनी 'शरारतें' करता है न वक्‍त। पता नहीं कब करवट बदल ले। एक पल लबों पर तब्‍बसुम तो अगले ही पल आंखों में अश्‍कों के दरिया ला देता है यह वक्‍त। जब यह माकूल होता है, तो हर ओर खुशियां ही नजर आती हैं। लेकिन जब बाद-ए-सबा लू में बदल जाती है, तो धूल के गुबार के सिवा कुछ नजर नहीं आता। हर ओर मायूसी और मातम के बादल दिखाई पड़ते हैं। हमें जिंदगी से कुछ होता है तो बस गिला, शिकवा और शिकायतें। लेकिन, जिंदगी हालात की मोहताज नहीं होती। आपका नजरिया बनाता है आपकी जिंदगी। आप जैसा सोचते हैं, जैसा देखना चाहते हैं, जिंदगी वैसी ही शक्‍ल अख्‍तियार कर आ जाती है आपके सामने। मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अगर नजरिया सही हो, तो हर चीज सही नजर आती है। ऊपर वाले ने आपको कई ऐसी नियामतें बक्‍शी हैं जिनके लिए आप उसका शुक्रिया अदा कर सकते हैं।

आप जिंदा हैं
यह क्‍या कम बड़ी बात है कि आज आप सांस ले रहे हैं। जान है तो जहां है का मतलब, जान बचाने से नहीं है। सही मायनों में वह यह कहना चाहता है कि जब तक आपकी जान है, तब तक जहां आपका है। जान है तो हवा का रुख बदल सकते हैं। जान है तो आप पूरी शिद्दत से जिंदगी की तस्‍वीर में अपनी पसंद के रंग भर सकते हैं। जान है तो अपने जुनून का पीछा कर सकते हैं। जान है तो आप मुश्किलों से दो-दो हाथ करने की तैयारी कर सकते हैं। यानी जान है तो, सारा जहां है।

रात को आप खाकर सोये
रोटी- यह इनसान की बुनियादी जरूरतों में यह सबसे पहली है। कहते हैं कि पेट की भूख से ही गुनाह पैदा होते हैं। जब पेट की भट्टी धधकती है तो इनसान का विवेक और सब्र सब खोने लगता है। उस वक्‍त कौन देखना चाहता है कि क्‍या सही है और क्‍या गलत। उस वक्‍त जायज-नाजायज का फर्क भी किसे समझ में आता है। पेट की भूख धर्म-अधर्म की रेखा को मिटाकर रख देती है। आप शुक्र मनाइये कि आपको भूख का सामना नहीं करना पड़ा। आप तसल्‍ली से भरपेट खाकर सोये। शुक्र मनाइये कि आपको इस रोटी के लिए किसी का मोहताज नहीं होना पड़ा। और अगर आपको अब भी न समझ आए तो किसी भूखे की आंखों के दर्द को महससू कीजियेगा। उसके उन फैले हाथों की ओर देखियेगा आपको समझ में आ जाएगा कि भूख क्‍या है और पेट भरा होना कुदरत का कितना बड़ा करम।

अपनी पसंद के कपड़े
कपड़ा- यह इनसान की दूसरी अहम जरूतर है कपड़े तन को ही नहीं आत्‍मा को भी ढंककर रखते हैं। अगर आप अपनी किसी ड्रेस को लेकर गुस्‍से में हैं, तो एक बार उन लोगों के बारे में सोचियेगा जिनके पास चुनने के लिए भी नहीं है। जब दिल उदास हो और यह अहसास हो कि आपकी जिंदगी में सिर्फ और सिर्फ खामियां हैं, तो एक बार उन लोगों के बारे में सोचियेगा जिनके चीथड़ों से बाहर झांकता शरीर न जाने कितनी गिद्ध दृष्टियों से छननी हो चुका होता है। अपनी पसंद के कपड़े पहनना यानी अपनी मर्जी के मुताबिक चलना- एक बार इस तरह सोचकर देखिये। और अगर आप अपनी मर्जी के मुताबिक फैसले ले सकते हैं यानी हालात आपकी सोच जितने खराब नहीं हैं।

आपको बाहर नहीं सोना पड़ा
मकान- तीसरी बुनियादी जरूरत। सिर पर छत होना कुदरत की बड़ी इनायत है। घर सिर्फ कंक्रीट की बनी चाहरदीवारी नहीं होता। सुरक्षा का दूसरा नाम है घर। सुकून, तसल्‍ली, अपनेपन, बेफिक्री को ही तो घर कहते हैं। एक ऐसा ठिकाना जहां आप रात को थके-मांदे लौट सकें। वो जगह जिसके आगोश में खुद को सौंपकर आप सब कुछ भूल सकें। वही तो होता है न घर। जो सर्दी, गर्मी और बारिशों में सब कुछ सहता है। जो अपनी पूरी ताकत लगा देता है हवाओं के खिलाफ, ताकि आप महफूज रह सकें। कभी शहरों की सड़कों पर देखियेगा, फुटपाथों पर जिंदगी कैसे रात काटने की तैयारी करती है। बारिशों में पुल के नीचे होने को मजबूर जिंदगी को देखेंगे तो आपको अपनी छत की अहमियत पता चलेगी। देखियेगा कैसे सर्द रातें आग के पास बैठकर गुजारी जाती हैं। तब महसूस होगा कि ईश्‍वर ने आपके सिर पर छत देकर कितना बड़ा अहसान किया है।

कोई है अपना
वक्‍त चाहे कितना ही मुश्किल क्‍यों न हो, किसी अपने का साथ उसकी तकलीफ कम कर देता है। जब कोई प्‍यार से आपके कंधे पर हाथ रखकर कहता है कि यार सब ठीक हो जाएगा, तो यूं लगता है जैसे दिल पर पड़ा बोझ किसी ने हल्‍का कर दिया। कोई कंधा जिस पर सिर रखकर आप रो सकें। कोई अपना जो अच्‍छे बुरे वक्‍त में आपके साथ खड़ा हो। कहते हैं इनसान न रोते अच्‍छा लगता है और हंसते। और अगर कोई है जो आपको प्‍यार करता है, तो वह आपकी खुशी में हंसेगा और आपके दुख में आंसू बहायेगा। वह प्‍यार करने वाला आपके मां-बाप हो सकते हैं और कोई प्‍यारा सा दोस्‍त भी। प्‍यार का मरहम हर जख्‍म भरने के लिए काफी होता है।

पीने का साफ पानी
क्‍या आप जानते हैं कि दूषित पानी से होने वाले डायरिया से हर साल 22 लाख लोग अपनी जान गंवाते हैं। तो अगर आपके हलक के नीचे उतरने वाला पानी का घूंठ साफ है, तो आप इसके लिए भी शुक्रगुजार हो सकते हैं। दुनिया में लाखों-करोड़ों लोगों को पीने का साफ पानी हासिल नहीं है। कितनी बुनियादी सी चीज है, लेकिन अब भी करोड़ों लोग इससे महरूम है। तो उन चीजों, जो आपको हासिल नहीं हैं, का गम मनाने के बजाय उन चीजों का शुक्र अदा करें जो आपको नसीब है।

इलाज है आपकी पहुंच में
नौ महीने की गर्भवती महिला येल्लावा को अपने बच्चे के सुरक्षित जन्म के लिए उफनती नदी में छलांग लगानी पड़ी। हालांकि 22 वर्षीय येल्‍लवा को तैरना नहीं आता था, फिर भी वह करीब डेढ़ घंटे तैरकर किनारे सही सलामत पहुंची। कर्नाटक के एक गांव में कृष्णा नदी का जल स्तर बढ़ता जा रहा था। आसपास कोई ठीक-ठाक हॉस्पिटल भी नहीं था और महिला को चार किलोमीटर दूर के हॉस्पिटल ले जाने के लिए कोई नाविक तैयार नहीं था। हैरतअंगेज कारनामे को अंजाम देने वाली येल्लावा ने अकेले ही नदी पार करके ऐसी बहादुरी का परिचय दिया कि हर साल बाढ़ का दंश झेलने वाले लोग हैरान हैं। और अगर आपकी कहानी इस जैसी नहीं है, तो आप इस बात का तो शुक्रिया अदा कर ही सकते हैं कि आपकी पहुंच में इलाज है। किसी बीमारी के संकेत नजर आते ही डॉक्‍टर तक आप फौरन पहुंच जाते हैं। कितने ही लोग हैं जो जरा सी खरोंच लगने पर मौत का ग्रास बन जाते हैं क्‍योंकि उन्‍हें डॉक्‍टरी सुविधा नहीं मिल पाती।

  Posted By on : 05-Dec-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

जब मुश्किल हों हालात

हमेशा तो खुश नहीं रहा जा सकता। लेकिन, ज्‍यादातर समय तो रहा ही जा सकता है। जीवन में अच्‍छे बुरे दिन आते रहते हैं। हम उन्‍हें कैसे जीते हैं फर्क इस बात से पड़ता है। नजरिया अगर सकारात्‍मक हो तो मुश्किलों में भी मुस्‍कुराया जा सकता है। कोई-कोई दिन ऐसा आता है जब कुछ भी आपके हिसाब से नहीं होता। सब उलट पुलट होता रहता है। ऐसे वक्‍त में जरूरी है कि आप हालात को खुद पर हावी न होने दें। आपको यह समझने की जरूरत होती है किे सब चीजें आपके बस में नहीं होतीं। और कई बार आपको वक्‍त को यूं ही जाने देना चाहिये। आखिर में आपके पास दो ही रास्‍ते बचते हैं, या तो आप बैठकर बस शिकायत करते रहें, या फिर वास्‍तविकता को स्‍वीकार कर जीवन में कुछ सकारात्‍मक करने का प्रयास करें। तो मुश्किल दिन में भी आप कुछ बातों का खयाल रख हालात को बेहतर बना सकते हैं।

दुख के बिना सुख का मजा कहां
सर्दी के बाद ही बसंत का मजा है। ज्‍येष्‍ठ की तपती गरमी के बाद ही सावन की बंदें अमृत समान लगती हैं। भूखे को ही रोटी का असली स्‍वाद पता होता है। जब तक किसी चीज को हासिल करने के लिए आपको कड़ी मेहनत न करनी पड़े उसका असल महत्‍व पता ही नहीं चलता। कहने का तात्‍पर्य केवल इतना है कि विविधता में ही जीवन का वास्‍तविक रस छुपा है। सुख-दुख में समान रहना ही जीवन का मूल मंत्र है। इस तथ्‍य को स्‍वीकार कर आप मुश्किल दिन में भी सुकून से रह सकते हैं।

कई दुआयें हैं आपके साथ
क्‍या हुआ जो वक्‍त जरा मुश्किल हैं। अब भी आपके साथ कई दुआयें हैं। जीवन हमेशा आपके सामने चुनौतियां लेकर आता है। लेकिन, यह भी मत भूलिये कि सर्वश्रेष्‍ठ आना अभी बाकी है। यह वक्‍त गुजर जाएगा और फिर जो कुछ होगा अच्‍छा ही होगा। जो नहीं है उसका मलाल करने के बजाय जो आपके पास है उसकी खुशी मनायें। प्रसन्‍नता और सफलता संसाधनों पर नहीं, उनके उपयोग पर निर्भर करती हैं।

सही सोच है सबसे जरूरी
बदलावों को स्‍वीकार करें। बार-बार पीछे मुड़कर देखने से आप कभी आगे नहीं बढ़ सकते। जिन चीजों पर आपका नियंत्रण नहीं उन्‍हें जाने दें। बेकार की चीजों पर जोर न दें। सकारात्‍मक रहें। सफल लोगों में सकारात्‍मकता सबसे बड़ा गुण होता है। जीवन के प्रति आपका नजरिया ही आपके जीवन की दिशा और दशा तय करता है। नकारात्‍मक दृष्टिकोण रखते हुए सकारात्‍मक जीवन कैसे जिया जा सकता है। मानसिक बाधाओं को खुद पर हावी न होने दें। स्‍वयं को इन बंधनों से आजाद करें।

हर बात कुछ सिखाती है
अनुभव से बड़ा कोई शिक्षक नहीं होता। अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप किस परिस्थिति से क्‍या शिक्षा लेते हैं। हो सकता है कि आपकी पढ़ी कोई किताब, आपकी देखी कोई फिल्‍म, ही आपके जीवन को नयी दिशा दे दे। हालात से आप सीखते हैं और कैसे उनका सामना करते हैं यही आपके व्‍यक्तित्‍व की पहचान होती है। जीवन के अनुभवों से सीखने की आपकी क्षमता ही व्‍‍यक्ति के रूप में आपके चरित्र का निर्माण करती है।

जो भी है बस यही इक पल है
हर लम्‍हा आपके लिए नयी शुरुआत और नया अंत होता है। आज आप जहां है उसके लिए शुक्रिया अदा करें। आप अपना अतीत बदल नहीं सकते और उस बारे में सोचते रहने से आप अपनी ऊर्जा नष्‍ट करते हैं। अगर आप अभी इस लम्‍हे में थोड़ा उदास या ऊर्जाहीन महसूस कर रहे हैं तो संभव हे कि अगला लम्‍हा तस्‍वीर पूरी तरह बदलकर रख दे।

आप पीड़ित नहीं हैं
अपने मुश्किल हालात के लिए किसी दूसरे व्‍यक्ति को जिम्‍मेदार न ठहरायें। क्‍योंकि आपकी खुशी और भावनाओं का नियंत्रण पूरी तरह से आपके हाथ में है। और यह बात खुद को याद दिलाते रहें। जब आप किसी दूसरे को अपने मौजूदा हालात और दुख का कारण मानते रहेंगे, तब तक उन्‍हें नियंत्रित करना भी आपके बस में नहीं रहेगा। सच यह है कि खुद को हालात का मारा न समझें। अपनी नाव के खुद नाखुदा बनें।

मुश्किलों बिना कुछ नहीं मिलता
कोई भी व्‍यक्ति गलती न करे ऐसा हो ही नहीं सकता। सफलता की राह में आप कई बार गलतियां करेंगे। उन गलतियों पर रोते रहने से तो आप कामयाब होने से रहे। आपको गलतियों से सीखकर आगे बढ़ना चाहिये। जीवन में हर चीज की एक कीमत होती है। फिट बॉडी के लिए पसीना बहाना ही पड़ेगा। और इसी तरह कामयाब बिजनेस के लिए आपको रात-दिन एक करना ही पड़ेंगे। थोड़े खतरे उठाये बिना कामयाबी कभी नहीं मिलती। यह भी संभव है कि आप कई बार नाकाम भी हों, लेकिन हारकर बैठ जाने वालों को इतिहास कभी माफ नहीं करता।

असहमति को करें स्‍वीकार
रिश्‍तों को लेकर हर इनसान की सोच जरा अलग होती है। किसी एक मुद्दे पर आपकी और आपके साथी की सोच में भी फर्क हो सकता है। इसे स्‍वीकार करें। कई बार बहस के जरिये खुद को सही साबित करने से बेहतर शांति होती है। हर बात में कूदना या हर बहस में शामिल होना जरूरी नहीं। दूसरों के विचारों और मतों को सुनें और अगर आप उनसे सहमत नहीं भी हैं, तो भी इस मतभिन्‍नता को स्‍वीकार करें।

जरा सी अधिक मेहनत
जब चीजें आपके हिसाब से न चल रही हों, तो भी काम को टालें नहीं। जरा सी ज्‍यादा मेहनत करने से न बचें। क्‍या पता कि आपका यह 'जरा' सी मेहनत आपको कामयाबी दिला दे। लोग क्‍या सोचते हैं यह जरूरी नहीं। आप खुद के बारे में क्‍या सोचते हैं यह ज्‍यादा जरूरी है। हमेशा अपना सर्वश्रेष्‍ठ करने की कोशिश कीजिये। अगर आप काम और जिम्‍मेदारी से बच रहे हैं, तो आप किसी और को नहीं, बल्कि खुद को ही धोखा दे रहे हैं। छोटी-छोटी बातों को दिल से मत लगाइये और हमेशा अपने काम में जुटे रहिये।

अब आगे बढ़ें
रात कितनी भी स्‍याह क्‍यों न हो, उसे तो खत्‍म होना ही है। अगर आप कदम दर कदम चलते रहें तो आपको अंदाजा भी नहीं होगा कि आप मुश्किल वक्‍त को कितना पीछे छोड़ आए हैं। तो स्‍वयं को याद दिलाते रहें कि चलते रहना ही जीवन का दूसरा नाम है। जीवन पानी की तरह होता है जो रुक जाए तो सड़ने लगता है और चलता रहे तो साफ रहता है। तो कभी भी न हार न मानें और संघर्ष करते रहें। आप देखेंगे कि वक्‍त धीरे-धीरे ही सही, लेकिन बदल रहा है।

गलतियों से सीखें
कोई भी व्‍यक्ति गलती न करे ऐसा हो ही नहीं सकता। सफलता की राह में आप कई बार गलतियां करेंगे। उन गलतियों पर रोते रहने से तो आप कामयाब होने से रहे। आपको गलतियों से सीखकर आगे बढ़ना चाहिये। जीवन में हर चीज की एक कीमत होती है। फिट बॉडी के लिए पसीना बहाना ही पड़ेगा। और इसी तरह कामयाब बिजनेस के लिए आपको रात-दिन एक करना ही पड़ेंगे। थोड़े खतरे उठाये बिना कामयाबी कभी नहीं मिलती। यह भी संभव है कि आप कई बार नाकाम भी हों, लेकिन हारकर बैठ जाने वालों को इतिहास कभी माफ नहीं करता।

  Posted By on : 02-Dec-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

प्‍यार की गाड़ी को कैसे लाएं पटरी पर

रिश्‍ते की गाड़ी कभी सरपट नहीं दौड़ती। इसमें उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। और अगर आप समय रहते अगर इन परेशानियों का सही आकलन कर लें, तो इन्‍हें आसानी से पार कर सकते हैं।

परेशानियां हर रिश्‍ते में आती हैं। और जो इनसे पार पाने का सलीका और तरीका सीख लेते हैं उनके रिश्‍ते में माधुर्य बना रहता है। वे साथ रहते हैं। परेशानियों का सामना करते हैं और समझ जाते हैं कि रोजमर्रा की परेशानियों से जूझते हुए अपने जीवन में कैसे आगे बढ़ना है। हर किसी का इससे निपटने का अपना अलग तरीका होता है। कुछ किताबों का रुख करते हैं तो कुछ सेमिनार और काउंसलिंग का तरीका अपनानते हैं। कुछ लोग कामयाब जोड़ों के जीवन पर नजर रखते हैं।
समस्‍या #1 : संवादहीनता

communication gap

संवादहीनता के कारण ही सबसे ज्‍यादा परेशानियां होती हैं। अपने फोन या टीवी पर नजर गढ़ाए रखकर आप संवाद स्‍थापित नहीं कर सकते। संवाद के लिए जरूरी है कि दो लोगों के शब्‍दों के बीच सीधा संबंध हो।
कैसे करें समाधान

एक दूसरे से औपचारिक मुलाकात करें। मिलें और संवाद करें कि आखिर आप दोनों के बीच क्‍या गड़बड़ चल रहा है। अगर आप विवाहित हैं और साथ रहते हैं, तो फोन बंद रखें और बच्‍चों से अलग होकर आराम से बात करें।
अगर आप ऊंची आवाज में बात किये बिना संवाद नहीं कर सकते, तो किसी सार्वजनिक स्‍थल पर जाएं। पार्क, लाइब्रेरी या रेस्‍तरां आदि किसी भी ऐसे स्‍थान पर जहां आपको ऊंची आवाज में बात करने में असहजता हो।
अपने साथी की बात न काटें। न ही कड़वी बात बोलें। इसके साथ ही अच्‍छे संवाद के लिए जरूरी है कि आप दूसरे साथी पर आरोप लगाने की शैली में बात न करें। आप दोनों मसलों को सुलझाने के लिए बैठे हैं न कि आरोप लगाने के लिए।
आपकी शारीरिक भाषा इस प्रकार की होनी चाहिये कि आप अपने साथी की सुन रहे हैं। अगर आप उसकी बातों को तवज्‍जो नहीं दे रहे हैं, तो फिर साथ बैठने का फायदा ही क्‍या। किसी भी बात पर त्‍वरित प्रतिक्रिया देने से बचें। अगर कोई बात समझ में न आयी हो, तो उसे दोहरकर अपने साथी से पुष्टि कर लें कि क्‍या उसने वही कहा है, जो आप समझ रहे हैं।

समस्‍या #2 - विश्‍वास की कमी

lack of trust
विश्‍वास किसी भी रिश्‍ते का आधार होता है। अगर रिश्‍ते में विश्‍वास की कमी है तो वह आगे नहीं बढ़ सकता। क्‍या आपको रिश्‍ते में कुछ ऐसे कारण नजर आते हैं जो आपको आगे नहीं बढ़ने देते। या फिर आप खुद दूसरों पर भरोसा करने से डरते हैं।
कैसे करें समाधान

वक्‍त देकर जरूर आयें। जो काम आपने करने की हामी भरी हो उसे जरूर करें।
अपने साथी से झूठ न बोलें। और बहस के दौरान भी गरिमा बनाये रखें।
दूसरों की भावनाओं का खयाल रखें। असहमति हो सकते है, लेकिन इससे अपने साथी की भावनाओं को आहत न होने दें।
गलत बातों पर ओवररिएक्‍ट न करें।
बहस के दौरान गढ़े मुर्दे न उखाड़ें।
ईर्ष्‍या न करें और अच्‍छे श्रोता बनें।

समस्‍या #3 : पैसा

money issue
रिश्‍तों के बीच पैसा आने से कई समस्‍यायें हो सकती हैं। कई बार यह समस्‍या शादी से पहले ही शुरू हो जाती है। अगर वाकई आप दोनों के रिश्‍ते के बीच पैसा अपने पैर पसार रहा है, तो बेहतर है कि आप दोनों गहरी सांस लेकर बैठें और फाइनेंस से जुड़े पहलुओं पर जरूरी चर्चा करें।

कैसे करें समाधान


अपनी मौजूदा वित्‍तीय स्थिति के प्रति ईमानदार रहें। अगर आर्थिक हालात थोड़े सख्‍त हों, तो अपने जीने के अंदाज में बदलाव लाना लाजमी है।
धन को लेकर गर्मागर्म बहस करने से बचें। इससे कोई नतीजा निकलने वाला नहीं है। जरूरत है कि आप अपनी वित्‍तीय नीतियों और प्राथमिकताओं के बारे में बैठकर बात करें।
इस तथ्‍य को स्‍वीकार करें कि एक साथी खर्च करेगा और दूसरा बचाने का काम करता है। इस बात को समझिये कि दोनों के अपने फायदे हैं। इस तथ्‍य को स्‍वीकार करें और एक दूसरे की इस आदत से सीखें।
अपनी कमाई और उधार आदि के बारे में अपने साथी से न छुपायें। आप दोनों को एक दूसरे के आर्थिक हालात के बारे में सही जानकारी होनी चाहिये।
आप दोनों साथ मिलकर अपने घर के खर्चों और बचत का बजट बनाइये।

समस्‍या #4 : कौन करेगा घर के काज


Household work
आजकल पति पत्‍नी दोनों कामकाजी होते हैं। और ऐसे में घर के छोटे मोटे काम कौन करेंगा, इस बात को लेकर भी दोनों के बीच झगड़े होते रहते हैं। आखिर इस समस्‍या से कैसे पार पाया जा सकता है।
कैसे करें समाधान

घर पर अपने कामों का सही प्रकार बंटवारा करें। काम को यूं ही फैलाकर न रखें। अपने कामों को लिखकर रखें और आराम से बैठकर उस पर बात करें।
अन्‍य विकल्‍पों का भी ध्‍यान रखें। अगर आप दोनों को घर की साफ-सफाई करना पसंद नहीं है, तो आप 'पेड सर्विस' भी रख सकते हैं। अगर किसी एक साथी को सफाई करना पसंद करना है, तो दूसरा साथी बाकी काम कर सकता है। कहने का अर्थ है कि आप दोनों को मिलजुल कर सारे काम निपटा लेने चाहिये।

समस्‍या #5 - प्राथमिकतायें

pririoty
अगर आप अपने जीवन में प्‍यार चाहते हैं, तो जरूरी है कि आप अपने रिश्‍ते को अहमियत दें। रिश्‍ते में अहं का कोई स्‍थान नहीं होता। मैं नहीं हम के आधार पर रिश्‍ता चलता है।

कैसे करें समाधान

प्‍यार को जवां बनाये रखने के लिए वही काम करें जो आप रिश्‍ते की शुरुआत में किया करते थे। एक दूसरे के प्रति आभार जतायें। एक दूसरे की तारीफ करें। एक दूसरे की बातों में रुचि दिखाना, इन सब कामों को दोहरायें।
अन्‍य जरूरी कामों की ही तरह साथ वक्‍त बिताने को भी अहमियत दें। याद रखिये परिवार जीवन की धुरी होता है और अगर यह धुरी बिगड़ जाए तो सारा जीवन बिगड़ जाता है।
एक दूसरे का सम्‍मान करें। एक दूसरे की अहमियत को समझें।

समस्‍या #6 - झगड़ा


conflict in couple
कभी-कभार झगड़ा होना आम बात है। लेकिन आप दोनों के बीच यह रोज की बात बन जाए तो वक्‍त आ गया है कि आप इस बारे में गंभीरता से सोचें। जानने का प्रयास करें कि आखिर वे कौन सेी बातें हैं जिनके कारण आप दोनों के बीच इतनी बहस होती है। रोजमर्रा की जिंदगी से ब्रेक लें।
कैसे करें समाधान

आप और आपका साथी संयमित तरीके से बात कर सकते हैं। अपने रिश्‍ते में संवाद का तरीका हमेशा सहज और संयमित ही रखें।
याद रखिये आप पीडि़त नहीं है, प्रतिक्रिया देना या न देना यह पूरी तरह आप पर ही निर्भर करता है।
स्‍वयं के प्रति ईमानदार रहें। जानें कि बहस के दौरान आप किस तरह के कमेंट करते हैं और उनके क्‍या नतीजे निकलते हैं।
अपनी गलती होने पर माफी मांग लेने में कोई बुराई नहीं। इससे आपका रिश्‍तो मजबूत ही होगा। अहं को छोड़कर अपने रिश्‍ते की मजबूती के बारे में सोचें।

 

रिश्‍ते में समस्‍यायें आएंगी, लेकिन अगर आप दोनों मिलकर उसका सामना करेंगे तो बेहतर रहेगा। कभी-कभार हंसी मजाक का तड़का लगायें और अपने रिश्‍ते में आनंद बनाये रखें।

  Posted By on : 28-Nov-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

ये टिप्स अपनाएं, 'ध्यान' का अधिक लाभ पाएं
कई बार ऐसा होता है कि हम ध्यान या मेडिटेशन करने के लिए बैठते तो हैं लेकिन एकाग्रता ना होने की वजह से हमारा मन ध्यान में नहीं लगता। नतीजा उसका उचित लाभ हमें नहीं मिल पाता। ऐसे में अगर आप भी ध्यान या मेडिटेशन की तैयारी कर रहे हैं तो अपनाएं ये सिंपल टिप्स और ध्यान का और भी गहरा अनुभव करें।

ओवरईटिंग से बचें- ध्यान से पहले खाना खाने से बचें। अगर खाना जरुरी है तो हल्का भोजन करें। मेडिटेशन से ठीक पहले अगर आप भरपेट खाना खाएंगे तो मेडिटेशन के दौरान आपको नींद आने लगेगी। साथ ही बिना किसी डिस्ट्रैक्शन के आपका आराम से बैठना मुश्किल हो जाएगा।

नहाएं- ध्यान से पहले नहाना भी एक अच्छा ऑप्शन है। वैसे ये अनिवार्य नहीं है। लेकिन अगर आप ध्यान से पहले नहाकर खुद को साफ सुथरा कर लेते हैं तो आपको भी ताजगी का एहसास होगा और आपका मूड पॉजिटिव रहेगा।

कंफर्टेबल रहें- मेडिटेशन के दौरान ढीले-ढाले आरामदायक कपड़े पहनें और इस बात पर गौर करें कि जिस जगह पर आप मेडिटेशन कर रहे हों वो जगह हल्की गर्म होनी चाहिए।

खुद को करें रिलैक्स- मेडिटेशन शुरु करने से पहले खुद को करें रिलैक्स करें। कोई ऐसा काम करें जो आपको पसंद हो। किताब पढ़ें, म्यूज़िक सुनें, थोड़ी देर वॉक कर लें।

गहरी सांस लें- मेडिटेशन से पहलें कुछ देर के लिए डीप ब्रीदिंग करें। 5-10 बार धीरे-धीरे गहरी सांस लें। हर एक सांस छोड़ने के साथ ही आप खुद को और ज्यादा रिलैक्स महसूस करेंगे।

माहौल बनाएं- जिस जगह आप मेडिटेशन करने वाले हैं वहां पहले मेडिटेशन का माहौल बनाएं। 1 या 2 मोमबत्ती जलाएं, धूप या सुगंधी जलाएं। इन सबसे आपका मन एकाग्रचित्त होगा और बिना किसी रुकावट या डिस्ट्रैक्शन के ध्यान में आपका मन लगेगा।
  Posted By on : 27-Nov-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

इनकम बढ़ाना चढ़ाते हैं, तो करें ये उपाय

अगर काफी मेहनत और कोशिशों के बाद भी आपकी आमदनी नहीं बढ़ पा रही है। तो हो सकता है इसकी वजह आपके घर में मौजूद हो। जिस घर में हमेशा अशांति और कलह का माहौल रहता है, वहां नकारात्मकता होती है। और ऐसी जगह लक्ष्मी का वास नहीं होता। लिहाजा घर में सुख-शांति और पॉजिटिव एनर्जी के संचार के लिए अपनाएं कुछ सरल उपाएं और बढ़ाएं अपनी इनकम।

साफ-सफाई रखें- घर में साफ-सफाई नहीं होने से दीवारों और सामानों पर धूल-मिट्टी जम जाती है, जिससे घर में नकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है। लिहाजा घर की नियमित रूप से सफाई करें। मंदिर में भी देवी-देवताओं पर चढ़ाए गए फूल दूसरे दिन हटा दें। सूखे पौधे या सूखे फूलों का गुलदस्ता भी घर में ना रखें। घर में सिर्फ इस्तेमाल में आने वाली वस्तुएं ही रखें। किसी तरह का फालतू सामान इक्ट्ठा ना होने दें।

बांसुरी रखें- घर में बांसुरी रखना भी शुभ माना जाता है। बांसुरी सम्मोहन, खुशी और आकर्षण का प्रतीक है। माना जाता है कि बांसुरी में से गुजर कर नकारात्मक ऊर्जा शुभ ऊर्जा में बदल जाती है। साथ ही, बांसुरी शांति व समृद्धि का भी प्रतीक है।

मनीप्लांट लगाएं- घर में मनीप्लांट लगाना भी अच्छा माना जाता है। लेकिन मनीप्लांट को घर के उत्तर-पूर्व भाग में गमले में लगाएं। इससे घर की नकारात्मकता दूर होगी और पॉजिटिव एनर्जी का संचार होगा।

शाम के वक्त सोएं नहीं- सूर्यास्त के समय किसी को भी लेटना या सोना नहीं चाहिए। इस समय को भगवान की आराधना और आरती के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इस समय सोने से लक्ष्मी नाराज होती हैं और व्यक्ति बीमार और सुस्त हो जाता है।

हनुमान जी की आराधना करें- सूर्यास्त के बाद हनुमानजी के मंदिर जाएं। दीपक जलाएं, पूजा अर्चना करें और हनुमान चालीसा का जप करें। इस उपाय से बहुत जल्द व्यक्ति का बुरा समय टल सकता है और धन संबंधी परेशानियां दूर हो सकती हैं।

  Posted By on : 26-Nov-2014 Post Comment > > | View all 1 Comments > >
 

युवा सोशल मीडिया पर इन बातों का रखें ध्‍यान

आजकल सोशल मीडिया युवाओं के जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। एक तरफ जहां यह हमें एक दूसरे को जोड़ने का सशक्त जरिया बन गया है वहीं लोग धड़ल्ले से इसका दुरुपयोग भी करते हैं। सोशल मीडिया पर आने से पहले युवाओं को कुछ बातों का खयाल रखना बहुत जरूरी है। क्योंकि सवाल आपकी सुरक्षा का है।

फोटो लॉक करें : सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा मामले फोटो के दुरुपयोग के आते हैं, इसलिए अपनी निजी तस्वीरों को अपलोड ना ही करें तो बेहतर है। अगर कोई तस्वीर अपलोड करते भी हैं तो उसकी प्राइवेसी सेटिंग जरूरत के हिसाब से रखें। सोशल मीडिया पर सुरक्षा के विकल्प भी मौजूद होते हैं बस जरूरत है आपको जानकारी होने की।

टैगिंग लॉक : बतौर सुरक्षा फोटो एलबम लॉक करने के बाद भी कई बार आपको किसी तस्वीर में टैग कर दिया जाता है, जिससे वह सार्वजनिक हो जाती है और इसका दुरुपयोग संभव है। इसलिए या तो टैंगिंग लॉक करें या फिर रिव्यू ऑन रखें, जिसमें तस्वीर को सार्वजनिक करने से पहले आपसे अनुमति ली जाएगी।

लॉगइन लोकेशन: फेसबुक जैसी कई सोशल नेटवर्किंग साइट लॉगइन लोकेशन का रिकॉर्ड रखती हैं। आप समय-समय पर इसे चैक कर पता कर सकते हैं कि कोई और आपका अकाउंट तो नहीं खोल रहा। फेसबुक पर यह विकल्प आपको सेटिंग में मिलेगा जहां सिक्योरिटी में आपको where you are logged in का विकल्प दिखेगा।

मोबाइल अलर्ट ऑन रखें : फेसबुक पर मोबाइल अलर्ट की सुविधा मौजूद है, जिससे जब भी आपका फेसबुक अकाउंट लॉगइन किया जाएगा आपके मोबाइल पर एसएमएस पहुंच जाएगा। फेसबुक पर इस विकल्प के लिए सेटिंग में जाएं फिर सिक्योरीटी और फिर लॉगइन नोटिफिकेशन में जाएं।

अनजान की फ्रेंड रिक्वेस्ट ना लें : फेसबुक पर कभी भी किसी अनजान की रिक्वेस्ट ना लें तो ही बेहतर है लेकिन आप फ्रेंडलिस्ट बढ़ाने के लिए रिक्वेस्ट स्वीकार करना चाहते हैं तो उसकी भली-भांति जांच करें। सबस पहले रिक्वेस्ट भेजने वाले से सवाल पूछें कि वह आपका दोस्त क्यों बनना चाहता है? आपका प्रोफाइल उसे कैसे मिला? प्रोफाइल को पढ़ें और प्रोफाइल फोटो की वास्तविकता की जांच करें। पूरी तरह आश्‍वस्‍त होने के बाद ही फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार करें।

खुद को गूगल पर सर्च करें : आपके बारे में इंटरनेट पर किस तरह की जानकारियां उपलब्ध हैं। यह आप अपने नाम को गूगल समेत विभिन्न सर्च इंजनों पर सर्च कर पता कर सकते हैं। इसमें टेक्स्ट और इमेज, दोनों सर्च करें। कोई आपत्तिजनक या व्यक्तिगत जानकारी या तस्वीर होने पर उसके स्रोत का पता कर उसे हटाने का प्रयास कर सकते हैं।

सिक्योरिटी क्वेशचन का चुनाव : पासवर्ड सेट करते समय अक्सर आपको एक सवाल सेट करना होता है। इसमें आप कोई ऐसा सवाल चुनें, जिसके जवाब का अंदाजा आपके प्रोफाइल के आधार पर न लगाया जा सके। इससे आपके सोशल मीडिया अकाउंट के हैक होने की आशंका कम हो जाती है।

ब्राउजर अपडेट करते रहें : अपने प्रोफाइल को सुरक्षित रखने के लिए आपको समय-समय पर अपने ब्राउजर (गूगल क्रोम, फायरफॉक्स आदि) को अपडेट करते रहना चाहिए। नए ब्राउजर्स में कई सुरक्षा संबंधित विकल्प आ रहे हैं, जो आपकी ऑनलाइन गतिविधियों के दौरान सुरक्षा प्रदान करते हैं।

कीप्ड लॉगइन ऑप्शन : सोशल मीडिया से जुड़ी कई वेबसाइट पर ‘कीप्ड लॉगइन’ का विकल्प मौजूद होता है, जिससे आपको बार-बार लॉगइन करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। साइबर कैफे या किसी सार्वजनिक कम्प्यूटरों पर लॉगइन करते समय इसका उपयोग न करें।

लिंक पर क्लिक करने से पहले सोचें : सोशल नेटवर्किंग से जुड़े ई-मेल अक्सर आते रहते हैं। साथ ही कई वेबसाइट्स पर सोशल नेटवर्किंग साइट की लिंक दी जाती है। इनके जरिए फेसबुक-ट्विटर आदि पर लॉगइन करने से जानकारी चोरी होने का खतरा होता है। बेहतर होगा आप ब्राउजर में ऊपर स्थित एड्रेस बार में ही साइट का नाम टाइप कर लॉगइन करें।

  Posted By on : 24-Nov-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

जल्दी उठना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन सुबह-सुबह करना चाहिए ये काम
आज के दौर में काफी अधिक ऐसे लोग हैं जो सूर्योदय से भी बहुत देर बाद बिस्तर का त्याग करते हैं। देर से उठने को अच्छी आदत नहीं माना जाता है। ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के समय हमें उठ जाना चाहिए। यह प्राचीन परंपरा है। वैसे थोड़ा मुश्किल है, लेकिन सुबह जल्दी उठेंगे तो स्वास्थ्य लाभ के साथ ही लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त कर सकते हैं। दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। यहां जानिए इस परंपरा से जुड़ी कुछ और खास बातें और सुबह-सुबह कौन-कौन से काम करना चाहिए...
 
सुबह-सुबह पीना चाहिए ऐसा पानी
 
सुबह जल्दी उठकर तांबे के बर्तन में रखा पानी पीना चाहिए। इसके लिए रात को सोते समय तांबे के लोटे में पानी भरकर रखें और सुबह उठकर इस पानी को पी लेना चाहिए। इस उपाय से पेट से संबंधित कई छोटी-छोटी बीमारियां स्वत: ही नष्ट हो सकती हैं। पेट साफ रहता है और त्वचा संबंधी रोगों में भी लाभ मिल सकता है। यह उपाय करने से पहले किसी चिकित्सक से परामर्श कर लेना चाहिए।

सुबह की शुरुआत अच्छी होगी तो दिन होगा अच्छा
 
ऐसा कहते हैं कि यदि किसी काम की शुरुआत अच्छी हो तो सब अच्छा ही अच्छा होता है। यह बात सुबह उठने की परंपरा पर भी लागू होती है। सुबह-सुबह जल्दी उठकर अपनी हथेलियों का दर्शन करेंगे तो आपका पूरा दिन शुभ हो सकता है। हथेली यानी कर दर्शन का महत्व सभी भलीभांति जानते हैं। ऐसा करने पर विष्णु, लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। बिस्तर से पैर नीचे रखते समय भूमि को भी प्रणाम करना चाहिए और पैर रखने के लिए क्षमा याचना करना चाहिए। ऐसा करने पर भूमि माता को पैर लगाने का दोष नहीं लगता है।

देर तक सोने पर मिलते ये हैं अशुभ फल
जो लोग नियमित रूप से सूर्योदय के बाद ही उठते हैं, उनके चेहरे का तेज खत्म होता है। बुढ़ापे से पहले ही त्वचा बेजान नजर आने लगती है। दिनभर आलस्य बना रहता है। कार्य के लिए ऊर्जा नहीं रहती है। शरीर बेडोल हो सकता है। पेट संबंधी बीमारियां हो सकती हैं। यदि लंबे समय तक इसी आदत का शिकार रहते हैं तो शरीर कमजोर हो सकता है। हमारी रोग प्रतिरोधी क्षमता कम हो सकती है। विज्ञान भी मानता है कि सुबह जल्दी उठना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है।
 
धार्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार इन अशुभ प्रभावों के साथ ही व्यक्ति को धर्म लाभ भी प्राप्त नहीं हो पाता है। देर तक सोने वाले व्यक्ति को देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त नहीं हो पाती है। कार्यों में कड़ी मेहनत के बाद भी आशा के अनुरूप फल प्राप्त नहीं हो पाते हैं। व्यक्तित्व का आकर्षक कम हो सकता है, इस कारण समाज में उचित मान-सम्मान प्राप्त नहीं हो पाता है।

सुबह जल्दी उठकर करना चाहिए योग और ध्यान

सुबह-सुबह जल्दी उठने के बाद नित्य कर्मों से निवृत्त होकर योग और ध्यान करना शरीर को ऊर्जावान बनाता है। जो लोग नियमित रूप से सुबह योग और ध्यान करते हैं, उनका व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक होता है। ऐसे लोगों से जो भी मिलता है, वह इनसे आकर्षित हो जाता है। चेहरे का तेज बढ़ता है। लंबे समय तक बुढ़ापे के रोगों से बचाव होता है। शरीर का अंग-अंग स्वस्थ रहता है।
 
सुबह की वायु होती है स्वास्थ्यवर्धक
सुबह की वायु बहुत ही फायदेमंद होती है। इस वजह से लोग टहलने जाते हैं। सुबह-सुबह वातावरण शुद्ध रहता है। वाहनों का शोर नहीं होता है और ना ही वाहनों से निकलने वाला जहरीला धुआं होता है। एकदम शुद्ध वायु शरीर को ऊर्जा देती है और स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है। यह हवा फेफड़ों की शुद्धि भी करती है। इस कारण सुबह जल्दी उठकर किसी हरियाली वाले क्षेत्र में टहलना चाहिए।
  Posted By on : 05-Nov-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

क्यों और कैसे मनाया जाता है धनतेरस
कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस कहते हैं। आज के दिन घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर रखा जाता है। यह त्योहार दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है। इस दिन नए बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन मृत्यु के देवता यमराज और भगवान धनवंतरी की पूजा का महत्व है।

क्यों मनाया जाता है धनतेरस का त्योहार- भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य का स्थान धन से ऊपर माना जाता रहा है। यह कहावत आज भी प्रचलित है कि 'पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया'इसलिए दीपावली में सबसे पहले धनतेरस को महत्व दिया जाता है। जो भारतीय संस्कृति के हिसाब से बिल्कुल अनुकूल है। शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धनवंतरी अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। मान्यता है कि भगवान धनवंतरी विष्णु के अंशावतार हैं। संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने धनवंतरी का अवतार लिया था। भगवान धनवंतरी के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

क्या खास करें इस दिन-
इस दिन अपने सामर्थ अनुसार किसी भी रूप में चांदी एवं अन्य धातु खरीदना अति शुभ है। धन संपत्ति की प्राप्ति हेतु कुबेर देवता के लिए घर के पूजा स्थल पर दीप दान करें एवं मृत्यु देवता यमराज के लिए मुख्य द्वार पर भी दीप दान करें।

इस दिन अपने घर की सफाई अवश्य करें। रूप और सौंदर्य प्राप्ति हेतु इस दिन शरीर पर उबटन लगाकर स्नान करें। अंजली पुत्र बजरंगबलि हनुमान का जन्म कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में हुआ था इसलिए हनुमान जयंती भी इसी दिन मनाई जाती है। ऐसे में सायं काल उनका पूजन एवं सुंदर कांड का पाठ अवश्य करें ।
  Posted By on : 13-Oct-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

कैसे स्वप्न के फल होते हैं शुभ और किसके अशुभ, जाने
शास्त्रों में स्वप्न के शुभ-अशुभ फलों का वर्णन है। कई बार ये स्वप्न भविष्य में होनेवाली घटनाओं का संकेत भी देते हैं। जब हम सोए रहते हैं तब हमारे शरीर पर हमारा कंट्रोल नहीं होता, लेकिन सूक्ष्म मन इस वक्त भी क्रियाशील होता है।
शास्त्रों के अनुसार रात के पहले हिस्से में देखे गए स्वप्न का फल एक वर्ष में, दूसरे प्रहर में देखे गए स्वप्न का फल करीब 8 महीने में, तीसरे प्रहर के स्वप्न का फल तीन महीने में और ब्रह्म मुहूर्त में देखे गए स्वप्न का फल अगले एक सप्ताह में और उठने से ठीक पहले देखे गए स्वप्न का फल ठीक उसी दिन प्राप्त होता है। आइए, जानें किस स्वप्न को देखने का क्या फल मिलता है..

. कई लोग स्वप्न में सफेद कपड़े देख कुछ अनहोनी की आशंका से ग्रसित हो जाते हैं, लेकिन माना जाता है कि सफेद कपड़े देखने का अर्थ मान-सम्मान की प्राप्ति है।

यदि सपने में किसी चुड़ैल का आपने दर्शन किया है तो कहते हैं कि आपकी धन हानि होनेवाली है।

यदि आपने सपने में देखा है कि कुछ सामने लिखे अक्षर आप पढ़ नहीं पा रहे हैं तो कहते हैं इसका अर्थ समझना चाहिए कि कोई विपत्ति आने का संकेत है यह।

यदि सपने में आपने खंडहर घर या कोई मकान देखा है तो कहते हैं यह शुभ फलदायक ही होता है। स्वप्न में खंडहर

यदि सपने में आपने खुद को चप्पल पहनते हुए देखा है तो समझ लें कि जल्द ही कोई यात्रा का योग बनने वाला है।

यदि सपने में आप ऊंची बिल्डिंग का दर्शन कर रहे हैं तो कहते हैं कि धन और यश की प्राप्ति का यह संकेत है।

यदि सपने में किसी ने आप पर हमला बोल दिया है तो डरिए मत, आपकी लंबी उम्र की ओर यह एक इशारा है।
  Posted By on : 17-Sep-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

थैंक्यू बोलिए, अपना बना लीजिए
एक नए अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि आभार प्रकट करने से सामाजिक रिश्ते मजबूत बनते हैं। यह अच्छी आदत है और इससे आप अपने मित्र का दिल भी जीत सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया न्यू साउथ वेल्स की साइकॉलजिस्ट लिसा विलियम्स ने बताया कि अध्ययन में इस बात के संकेत मिले हैं कि थैंक्यू कहने से बेहतर संबंध स्थापित होते हैं।
लिसा ने बताया कि यह स्टडी यूनिवर्सिटी के 70 स्टूडेंट्स पर की गई। यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स ने हाई स्कूल के स्टूडेंट्स को यूनिवर्सिटी में ऐडमिशन लेने में मदद की। उन्हें इस पर कॉमेंट करने को कहा गया। जवाब में उन्होंने पाया कि आधे से अधिक मामलों में मदद पाने वाले स्टूडेंट्स ने आभार व्यक्त किया और कहा, 'आपने मेरे लिए बहुत कुछ किया, इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद!' इन स्टूडेंट्स ने एक-दूसरे से फोन नंबर और ईमेल अड्रेस भी एक्सचेंज किए।
दूसरी तरफ, जिन स्टूडेंट्स ने यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स का आभार प्रकट नहीं किया था, उनकी बातचीत और आगे नहीं बढ़ी। लिसा ने कहा, मेरा पहला अनुभव बताता है कि धन्यवाद बोलने या आभार प्रकट करने से अनजान व्यक्ति से भी अच्छे संबंध बनने लगते हैं। इस अध्ययन को इमोशन जर्नल में शामिल किया जाएगा।
  Posted By on : 30-Aug-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

मेजर ध्यानचंद की जिंदगी से जुड़ीं 15 बातें!
हॉकी के 'जादूगर' मेजर ध्यानचंद का आज 109वां जन्मदिन है। मेजर ध्यानचंद की बदौलत कई सालों तक हॉकी में भारत का दबदबा बना रहा। जानते हैं ध्यानचंद के जीवन से जुड़ी अहम बातें।
* क्रिकेट में जो स्थान डॉन ब्रैडमैन, फुटबॉल में पेले और टेनिस में रॉड लेवर का है, हॉकी में वही स्थान ध्यानचंद का है।
* 21 वर्ष की उम्र में उन्हें न्यूजीलैंड जानेवाली भारतीय टीम में चुन लिया गया। इस दौरे में भारतीय सेना की टीम ने 21 में से 18 मैच जीते।
* 23 वर्ष की उम्र में ध्यानचंद 1928 के एम्सटरडम ओलंपिक में पहली बार हिस्सा ले रही भारतीय हॉकी टीम के सदस्य थे। यहां चार मैचों में भारतीय टीम ने 23 गोल किए।
* ध्यानचंद के बारे में मशहूर है कि उन्होंने हॉकी के इतिहास में सबसे ज्यादा गोल किए।
* 1932 में लॉस एंजिल्स ओलंपिक में भारत ने अमेरिका को 24-1 के रिकॉर्ड अंतर से हराया। इस मैच में ध्यानचंद और उनके बड़े भाई रूप सिंह ने आठ-आठ गोल ठोंके।
* 1936 के बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे। 15 अगस्त, 1936 को हुए फाइनल में भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया।
* 1948 में 43 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतरराट्रीय हॉकी को अलविदा कहा।
* हिटलर ने स्वयं ध्यानचंद को जर्मन सेना में शामिल कर एक बड़ा पद देने की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने भारत में ही रहना पसंद किया।
* वियना के एक स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है, जिसमें उनको चार हाथों में चार स्टिक पकड़े हुए दिखाया गया है।
* 1956 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनके जन्मदिन को भारत का राष्ट्रीय खेल दिवस घोषित किया गया है।
* इसी दिन खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं।
* विश्व हॉकी जगत के शिखर पर जादूगर की तरह छाए रहने वाले मेजर ध्यानचंद का 3 दिसम्बर, 1979 को देहांत हो गया।
* झांसी में उनका अंतिम संस्कार किसी घाट पर न होकर उस मैदान पर किया गया, जहां वो हॉकी खेला करते थे।
* अपनी आत्मकथा 'गोल' में उन्होंने लिखा था, आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बहुत साधारण आदमी हूं।
  Posted By on : 29-Aug-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >
 

global meet of KUlshrestha
which will be right period to hold this event.feel frre to communicate to us
  Posted By Dr Indresh Narayan Kulshrestha on : 06-Aug-2014 Post Comment > > | View all 0 Comments > >